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सत्ता की खातिर विचारधारा की बलि

महाराष्ट्र में शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस गठबंधन की सरकार भारतीय राजनीति में विचारधारा के अंत का ही नहीं, बल्कि विचारधारा पर राजनीतिक महत्वाकांक्षा के हावी होने का भी ज्वलंत उदाहरण है।

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गठबंधन नेताओं का अभिवादन
ছবি: Photo: Shrirampur / Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)

महाराष्ट्र में अंततः उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बन ही गई। यह भारतीय राजनीति में विचारधारा के अंत का ही नहीं, वरन विचारधारा पर राजनीतिक महत्वाकांक्षा के हावी होने का भी ज्वलंत उदाहरण है। कल तक शिवसेना और कांग्रेस-राकांपा विचारधारा के दो ध्रुवों की तरह थे। शिवसेना जहां कट्टर हिंदुत्ववादी यानी दक्षिणपंथी पार्टी के रूप में जानी जाती थी, वहीं कांग्रेस और राकांपा वाम-मध्यमार्गी के रूप में। दोनों में गंभीर वैचारिक मतभेद रहे, लेकिन आज सत्ता की खातिर दोनों ही ध्रुवों ने वैचारिक मतभेद भुलाकर एक-दूसरे का हाथ थाम लिया।

समय ही बताएगा कि यह प्रयोग कितने दिनों चलेगा, लेकिन इतना निश्चित है कि इसका खामियाजा इन तीनों ही दलों को उठाना पड़ेगा। ऐसा ही प्रयोग कुछ समय पूर्व कांग्रेस ने कर्नाटक में जद(एस) के साथ और यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ किया था। इसके परिणाम उसके लिए घातक ही रहे थे। इसी की पुनरावृत्ति 2019 में यूपी में सपा-बसपा ने लोकसभा चुनाव में की और उसमें दोनों को ही नुकसान हुआ।

ऐसा माना जाता है कि जनता की याददाश्त कमजोर होती है, लेकिन उसकी याददाश्त इतनी भी कमजोर नहीं होती कि राजनीतिक दलों और राजनेताओं की गंभीर गलतियों को बिल्कुल भूल जाए। इसीलिए चुनावों में सरकारें अक्सर बदल जाया करती हैं। विचारधारा राजनीति की आत्मा होती है। जिन राजनीतिक दलों का भारतीय लोकतंत्र में पराभव हुआ है या हो रहा है, उन्हें यह समझना चाहिए कि उनसे गलती कहां हो रही है? आखिर जनता को एक दल और दूसरे दल में फर्क करने का कोई तो ठोस आधार चाहिए।

शिवसेना को आज ये नहीं समझ में आ रहा कि भविष्य में उसे अपनी वैचारिक जमीन छोड़ने की क्या कीमत चुकानी पड़ेगी? जो लोग शिवसेना के साथ हैं, वे जरूर असहज होंगे। जो सैद्धांतिक लड़ाई उन्होंने कांग्रेस और राकांपा के खिलाफ दशकों से लड़ी, आज उस पर पानी फिर गया। ऐसे लोग क्यों न भाजपा की ओर आकृष्ट हों? यहां वे वैचारिक रूप से खुद को ज्यादा सहज पाएंगे। शिवसेना सरीखा हश्र कांग्रेस का भी होगा। महाराष्ट्र में शिवसेना सरकार में सम्मिलित होकर पार्टी ने देश में क्या कुछ नहीं खोया? आखिर जो कांग्रेस भाजपा को अपना धुर वैचारिक विरोधी मानती है, वह उसके उग्र संस्करण शिवसेना से हाथ कैसे मिला सकती है? या तो कांग्रेस पहले गलत थी या अब गलत है?

शिवसेना तो एक प्रादेशिक पार्टी है, उसका हित तो सीमित है, लेकिन कांग्रेस को तो अपने वृहद राष्ट्रीय हित के बारे में सोचना चाहिए था। क्या आगामी चुनावों में कांग्रेस के पास वैचारिक स्तर पर भाजपा के विरोध का कोई आधार होगा? यदि एक विचारधारा है तो नीतियां भी एक जैसी होंगी, निर्णय और कार्यक्रम भी एक जैसे होंगे। फिर जनता को पार्टी बदलने से क्या बदलाव मिलेगा, क्या लाभ होगा?

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विद्वान डेनियल बेल ने अपनी पुस्तक 'विचारधारा के अंत' में कहा था कि किसी भी देश के उन्नत आर्थिक-सामाजिक ढांचे की संरचना में विकास की अहम भूमिका होती है, विचारधारा की नहीं। उनके अनुसार विभिन्न राजनीतिक विषयों जैसे लोक-कल्याणकारी राज्य, शक्ति विकेंद्रीकरण, मिश्रित अर्थव्यवस्था और बहुलवाद पर सभी विचारधाराओं में मतैक्य है। एक अन्य अमेरिकी विद्वान फ्रांसिस फुकुयामा ने इसे आगे बढ़ाते हुए कहा था कि ऐसा नहीं कि विचारधाराओं का अंत हो गया है, वरन विचारधाराओं के संघर्ष में दक्षिणपंथी विचारधारा ने अंतिम व स्थायी रूप से पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है और यही विचारधारा मानवता को भविष्य में निर्देशित करती रहेगी।

एक तरह से देखा जाए तो दक्षिणपंथी शिवसेना द्वारा बहुत कम सीटें प्राप्त होने के बाद भी उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाना डेनियल बेल और फुकुयामा की भविष्यवाणियों को प्रमाणित करता है। एक साथ चुनाव लड़ने के बाद भी कांग्रेस और राकांपा को शिवसेना के आगे घुटने टेकने पड़े। ऐसा करके कांग्रेस और राकांपा ने अपनी विचारधारा को अप्रासंगिक बना दिया है।

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