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সরকারি প্রকল্প

छात्रों को सीधी आर्थिक मदद का विकल्प

सरकारी शिक्षा पर भारी खर्च के बावजूद गुणवत्ता कमजोर है। जो रकम आज सरकारी अध्यापकों को पोषित करने में जा रही है, उसे सीधे विद्यार्थियों को वाउचर के रूप में दिया जाए तो शिक्षा का अधिकार भी मिलेगा और गुणवत्ता भी सुधरेगी।

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कक्षा में पढ़ाई करते भारतीय छात्र
ছবি: Photo: Swastik Arora / Unsplash

तमाम विश्लेषकों का मत है कि आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय शिक्षा का है। आने वाला समय नयी तकनीकों के सृजन का होगा। यदि हमारे युवा नयी तकनीकों की खोज कर सकेंगे तो भारत आगे बढ़ेगा अन्यथा हम पिछड़ते जायेंगे। हमारे युवाओं को इस दिशा में प्रेरित करने के लिए प्राथमिक शिक्षा में सुधार सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। वहीं पर युवाओं की नींव रखी जाती है लेकिन यहीं हालत खस्ता है। विद्यार्थियों की रुचि पढ़ने की नहीं है क्योंकि उनकी दृष्टि केवल हाई स्कूल का सर्टिफिकेट हासिल करने की होती है, जिससे वे सरकारी नौकरी का आवेदन भर सकें।

अध्यापकों की भी पढ़ाने में रुचि नहीं होती क्योंकि उनकी सेवायें सुरक्षित रहती हैं और उनके संगठनों के राजनैतिक दबाव में कोई भी सरकार सख्त कदम उठाने को तैयार नहीं है। बीते समय में बायोमेट्रिक हाजिरी इत्यादि के सुधार से अध्यापकों का विद्यालय में पहुंचना सुनिश्चित हुआ है परन्तु इसके बावजूद मूल शिक्षा की परिस्थिति पूर्ववत कमजोर है। जैसे घोड़े को पानी तक ले जाया जा सकता है परन्तु उसे पानी पिलाया नहीं जा सकता।

कुछ समय पहले मुझे फैजाबाद के सरकारी इंटर कॉलेज में जाने का अवसर मिला जहां से मैंने शिक्षा पायी थी। साठ के दशक में वह जिले का सर्वश्रेष्ठ विद्यालय था। हमारे अध्यापक मनोयोग से पढ़ाते थे। वर्तमान में देखा कि छात्र केवल मध्याह्न तक कक्षा में आते थे, जिससे कि वे मध्याह्न भोजन प्राप्त कर सकें। इसके बाद वे और अध्यापक दोनों ही विद्यालय छोड़ कर चले जाते थे और ट्यूटोरियल में वही छात्र उन्हीं शिक्षकों से बाहर बड़ी ऊंची रकम देकर शिक्षा प्राप्त करते थे। अर्थ हुआ कि अध्यापक पढ़ाने को सक्षम हैं लेकिन विद्यालय में पढ़ाने में उनकी रुचि नहीं है। और, चूंकि वे विद्यालय में नहीं पढ़ाते हैं, इसलिए छात्र मजबूरन ट्यूटोरियल में उन्हीं से पढ़ने को मजबूर होते हैं। मिड डे मील आदि योजनाओं का उद्देश्य चाहे जो भी रहा हो, वास्तविकता यह है कि इनके माध्यम से कमजोर छात्र सरकारी विद्यालयों में दाखिला लेने को आकर्षित होते हैं और वे घटिया शिक्षा प्राप्त करते हैं।

और भी विशेष यह कि इन सरकारी अध्यापकों का वेतन लगभग पचास हजार प्रति माह है। जबकि समकक्ष निजी विद्यालयों में शिक्षकों का वेतन दस हजार रुपये मात्र है। फिर भी निजी विद्यालयों के रिजल्ट सरकारी विद्यालयों की तुलना में उत्तम हैं जो कि बताते हैं कि मूल परेशानी है कि सरकारी अध्यापकों की पढ़ाने में रुचि नहीं है। इस दिशा में सरकार द्वारा प्रयास किये जाने के बावजूद सार्थक परिणाम नहीं आये हैं। इसी विद्यालय के एक प्रधानाचार्य ने बताया कि उन्होंने शिक्षकों को कहा था कि वे प्रतिदिन प्रातः छात्रों को आज की खबर बतायें और समझायें। परन्तु शिक्षकों ने कोई रुचि नहीं ली।

इसके बावजूद शिक्षा पर सरकार द्वारा भारी रकम व्यय की जा रही है। प्राइमरी शिक्षा में उत्तर प्रदेश ने वर्ष 2017-18 में 50,142 करोड़ रुपये खर्च किये थे। राज्य में शिक्षा प्राप्त करने की आयु के कुल 3.8 करोड़ बच्चे हैं। यदि इस रकम को सरकारी अध्यापकों को वितरित करने के स्थान पर छात्रों को सीधे वितरित कर दिया जाये तो प्रत्येक छात्र को 14,547 रुपये प्रति वर्ष दिए जा सकते हैं। सरकार पर एक रुपये का भी अतिरिक्त बोझ नहीं आएगा। इस रकम से छात्र अपने मनचाहे ट्यूटोरियल अथवा विद्यालय की फीस अदा कर सकते हैं। वर्तमान में यह रकम शिक्षा को नहीं, अपितु शिक्षकों को दी जा रही है। दोनों में बहुत फासला है। बल्कि सरकारी विद्यालयों के पास उपलब्ध विशाल जमीन एवं मकानों को प्राइवेट विद्यालयों को लीज पर देने से सरकार अच्छी रकम अर्जित कर सकती है। छात्रों का शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार भी सुरक्षित रहेगा।

नेशनल सेम्पल सर्वे द्वारा पाया गया कि वर्ष 2014 में देश के प्राथमिक विद्यालयों में आधे विद्यालयों की फीस 417 रुपये से कम थी, आधे विद्यालयों की इससे अधिक। इसे मीडियन कहा जाता है। इसे हम देश के विद्यालयों की सामान्य फीस मान सकते हैं। वर्तमान में यह फीस लगभग 800 रुपया प्रति माह होगी। तदनुसार वर्ष में 9,600 रुपया प्रति वर्ष की सामान्य फीस होगी। यदि उत्तर प्रदेश के सभी स्कूल जाने योग्य बच्चों को यह 14,547 रुपये प्रति वर्ष की रकम दे दी जाये, तो वे इससे अपनी फीस को अदा कर सकते हैं।

इन वाउचरों के माध्यम से विद्यालयों में आपसी प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होगी। हर विद्यालय को अपनी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना होगा, जिससे कि अधिकाधिक संख्या में छात्र उनके विद्यालय में दाखिला लें और इन वाउचरों के माध्यम से वे सरकार से रकम उठा सकें। विश्व में तमाम देशों में पाया गया कि प्रतिस्पर्धा से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि सरकारी अध्यापकों से कार्य लेने पर प्रयास करने के स्थान पर सरकारी अध्यापकों की अकर्मण्यता की मूल समस्या को हल करे। जो रकम आज सरकारी अध्यापकों को पोषित करने में जा रही है, उसे सीधे विद्यार्थियों को दें, जिससे कि शिक्षा का अधिकार भी हासिल होगा और शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार होगा।

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