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नारी शक्ति

धरा पुत्री जानकी: आधुनिक परिप्रेक्ष्य में

रामायण में रामजी का नहीं, सीताजी का चरित्र मुख्य है। मर्यादाओं में बंधी फिर भी स्वाभिमानी, समर्पित फिर भी अपने अधिकार के लिए जागरूक जानकी के जीवन को आधुनिक दृष्टि से देखता एक लेख।

धरा पुत्री जानकी का पारंपरिक चित्र
फ़ोटो: Photo: Balasaheb Pant Pratinidhi / Wikimedia Commons (Public domain)

भारतीय वाङ्मय में जनकनंदिनी जानकी का चरित्र अद्वितीय है, अद्भुत है। असीम सामाजिक मर्यादाओं में भी बंधा हुआ है, फिर भी उन्मुक्त है। उनकी अपनी सोच है, उनका परिमार्जित विचार है। वाल्मीकि जी तो स्वयं सीता जी के चरित्र से आविर्भूत दिखते हैं। उनका कहना भी है कि रामायण में रामजी का नहीं, श्रीसीताजी का ही चरित्र मुख्य है। रामायण से सीताजी का चरित्र निकाल दिया जाए, तो रामायण के राम में कोई विशेषता नहीं दिखती है। वह वास्तव में महान हैं। पूर्णतः सिर से पांव तक एक संपूर्ण भारतीय नारी, जिसके जीवन की मंजिल पितृ गृह के बाद पति गृह ही होती है, लेकिन उसके बावजूद उसका स्वयं का भी अस्तित्व सर्वथा प्रखर रहता है।

शास्त्र में लिखा गया है कि “पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ”। पुत्र बहुत योग्य हो तो एक कुल का ही — पितृ कुल का — उद्धार करता है। परंतु स्त्री बहुत योग्य हो, स्वधर्म का बराबर पालन करती हो, तो वह पति और पिता दोनों कुल का उद्धारक बन सकती है। सीताजी ने जगत को स्त्री धर्म समझाया है। वास्तव में साधारणतया महिलाएं पुरुषों से ज्यादा सहनशील, विचारशील एवं उदार होती हैं। वह अपना जन्म स्थान, अपने माता-पिता को छोड़कर, दूसरे परिवार को अपना कर दत्तचित्त से उसको संवारने में लग जाती है (अपवाद छोड़कर)।

वैदेही का परिचय देते हुए सासु माता कौशल्या कहती हैं, “पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु। पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु॥” (अयोध्याकाण्ड दोहा 58, पृष्ठ 331) अर्थात इनके पिता जनक जी राजाओं के शिरोमणि हैं, ससुर सूर्यकुल के सूर्य हैं, और पति सूर्यकुल रूपी कुमुदवन को विकसित करने वाले चंद्रमा तथा गुण और रूप के भंडार हैं। ऐसी विलक्षण स्त्री सीता का सौभाग्य तो अपरंपार है।

पुष्प वाटिका में वैदेही

रामचरितमानस में वैदेही के विशिष्ट लक्षणों से हमारा साक्षात्कार बालकांड से ही प्रारंभ हो जाता है।

पुष्प वाटिका में सखियों के साथ पूजा के लिए फूल तोड़ते समय उनका बालिका सुलभ उन्मुक्त व्यवहार झलकता है। सखियों के कहने पर कि अयोध्या के राजा दशरथ के दो अत्यंत ही सुदर्शन राजकुमार राम और लक्ष्मण भी इस वाटिका में पधारे हुए हैं, उनके सौंदर्य का वर्णन सुनकर वैदेही का नारी सुलभ हृदय मचल उठता है, उन्हें देखने के लिए। चकित हिरनी की भांति वह इधर-उधर देख रही होती हैं कि तभी लतागुल्म के मध्य से दोनों भाई प्रकट होते हैं। उनकी भी दृष्टि इन्हीं पर अवस्थित, विराम की मुद्रा में समाहित है। उन्हें देखते ही वैदेही अपनी सुधबुध खो बैठती हैं। एक क्षण के लिए सकुचाकर अपने कमल के समान दो खूबसूरत आंखें बंद कर लेती हैं, फिर खोल देती हैं। सामने आपादमस्तक रूप के अथाह सागर, सांवले सलोने श्रीराम खड़े उन्हीं को निहार रहे हैं।

उनकी चोरी पकड़ी गई, ऐसा सोचकर वह एक पल के लिए कुछ विचलित-सी अवश्य हो जाती हैं। मानिनी ये कैसे स्वीकार कर ले कि वह उनसे, उनके परम विशिष्ट व्यक्तित्व से मूर्छित-सी हो रही है। झटके से अपनी आंखों को उन गुलाब के विकसित पुष्पों पर केंद्रित कर लेती हैं जिसके पार्श्व में रघुनाथ खड़े हैं। फिर किसी विशिष्ट की वहां उपस्थिति से लापरवाह-सी, अत्यंत चतुराई से अपने आप को संभालती हुई, अपना आंचल ठीक करती हुई, वह इधर-उधर मृग, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने बार-बार घूमकर राम की छवि नैनों में बसाए पुलकित हो रही हैं। उनका हृदय भावविभोर हो रहा है। प्रेम की अमूल्य भावनाओं का स्वार्गिक आभास होने लगा है। क्या इस अद्भुत प्रेम की यह सुमधुर ध्वनि उनके हृदय प्रदेश में भी अनुगुंजित हो रही होगी? वे भी मेरे संदर्भ में कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे क्या?

अनायास उन्हें अपने पिता के कठिन प्रण का स्मरण हो जाता है, और उनके चंद्रमा समान मुखमंडल पर समशीतोष्ण मौसम में भी स्वेद बिंदुओं की झालरें लटकने लगती हैं। व्याकुल-सी वह चपल गति से वहां से निकलकर आगे आ जाती हैं, जहां नित्य प्रातःकाल उनका एक प्रहर व्यतीत होता है, अर्थात अपनी आराध्या मां भवानी के समीप।

पुष्पवाटिका के दाहिने ओर अवस्थित मां पार्वती के मंदिर में जाकर घुटने टेककर प्रार्थना करती हैं, “जय जय गिरिबरराज किसोरी”। उनके समक्ष अपनी इस प्रेमाधीरता पर स्वयं सकुचा जाती हैं, मगर फिर उनके मन में अपने इस नवजात स्नेह पर असीम भरोसा भी हो उठता है, और वह आश्वस्त हो जाती हैं कि ‘जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥’ मां पार्वती भी मुग्ध हो गई हैं — ‘सुनु सिय सत्य असीस हमारी’ और ‘खसी माल मूरति मुसुकानी’। मां आशीर्वचन देती हैं, ‘पूजिहि मन कामना तुम्हारी’। भगवान में उनकी असीम भक्ति है।

धनुष भंग और विवाह

उधर धनुष नहीं तोड़ पाने के दुख में पराजित बाहुबली नरेशों की कुंठाएं बढ़ती जा रही हैं। वे श्रीराम को ईर्ष्या और द्वेष से देखते हुए, वैदेही को बलात ले जाने या युद्ध में विजयी होकर ले जाने की बात जोर-जोर से करने लगे थे। राम अपने गुरु वशिष्ठ के पास चले गए और सीता अपनी माता के पास आकर दुष्ट राजाओं की अनैतिकताओं के विषय में सोचने लगीं कि न जाने विधाता ने क्या सोच रखा है। क्रोध से बंकिम भृकुटि किए झरोखे से वह राजाओं की ओर देख रही हैं। राम के बारे में अब किसी भी प्रकार की अप्रिय बातें सुनना उन्हें तनिक भी पसंद नहीं है। मन ही मन भवानी को स्मरण करती वह उनसे श्रीराम को विजयी घोषित करवाने की प्रार्थना लगातार करती जा रही हैं। उनकी प्रार्थना सुन ली गई। उन महान उपस्थित महारथियों के सामने कोमल किसलय समान बालक ने धनुष खंडित करने का गौरव हासिल कर लिया। चारों ओर हर्षध्वनि की एक सुमधुर गर्जना-सी होने लगी। जानकी से बढ़कर आज कौन यहां प्रसन्न और भाग्यशाली है?

जानकी जी कितनी मृदुभाषी हैं, ममतामयी और कर्तव्यपरायण हैं, इसकी सूचना दशरथ जी को राजा जनक के उस सेवक से मिल जाती है जो विवाह का पत्र लेकर अयोध्या राजा दशरथ के दरबार में आता है। राजा अपने पुत्रों का कुशल जानकर और उनके विवाह का समाचार पाकर अत्यंत भावुक होकर अपने गले से मुक्ताहार निकालकर सेवक को इनाम देने लगे तो वह बड़ी विनम्रता से अस्वीकार कर देता है कि बेटी के ससुराल का तो पानी भी नहीं पी सकता है। राजा हैरान! उन्हें असमंजस में पड़ा देखकर सेवक कहता है, “ठीक है, बेटी तो राजा जनक की है, किन्तु सीताजी सेवकों को भी पिता के समान सम्मान देती हैं, तो वह बेटी ही न हुईं।” राजा दशरथ की आंखें भर आती हैं — इतनी विचारवान, शीलवान सीता उनकी पुत्रवधू बनकर आने वाली हैं।

स्वभाव से शर्मीली भी हैं। वरमाला के समय भी अत्यंत भाव-विह्वलता और लज्जा के मारे उनसे श्रीराम के गले में माला पहनाई ही नहीं जा रही है।

विवाह के पश्चात भी सखियों के बार-बार कहने पर गौतम पत्नी अहिल्या का स्मरण कर वह श्रीराम का चरण स्पर्श नहीं कर पा रही थीं।

पितृ गृह की आज्ञाकारिणी, सबकी दुलारी, प्रिय वैदेही अयोध्या, अपने पतिगृह आकर भी अपना सदाचार, सद्विवेक, संस्कार और मर्यादा नहीं भूलतीं। सास-ससुर का मन से सम्मान, छोटे देवरों से, देवरानियों से, सगे संबंधियों के अलावा महल के दास, अनुचर, प्रजा से उनका सौहार्दपूर्ण व्यवहार हुआ। अत्यंत मृदुभाषिणी, कोमलांगी, माधुर्य रस से ओतप्रोत वैदेही सिर्फ और सिर्फ वैदेही हैं।

वन गमन का संकल्प

श्रीराम के वन गमन की खबर सुनकर अत्यंत व्याकुल होकर वैदेही अपनी सास कौशल्या माता के समीप आकर, उनके दोनों चरणों की वंदना करके सिर झुकाए चुपचाप खड़ी हैं। राम वहीं हैं। सास उन्हें अनंत आशीष दे रही हैं, मगर वैदेही का ध्यान तो कहीं और, क्षितिज के सामने वाले कोने में टंगा हुआ है। जीवननाथ वन जाएंगे, देखें उनके साथ कौन जाता है — शरीर और प्राण दोनों, या केवल प्राण। विधि के विधान को कौन समझ सका है। उनकी मनोव्यथा को माता कौशल्या भली-भांति परख रही हैं। वे श्रीराम से कहती हैं, “हे तात सुनो, वैदेही अत्यंत सुकुमारी है एवं सास-ससुर संग अन्य कुटुंबीजनों की भी दुलारी है। महान जनक की पुत्री और दशरथ की पुत्रवधू और श्रीराम, आपकी अर्धांगिनी है। यह तो परम सौभाग्यशाली स्त्री है। मैंने रूप की राशि, गुण और सौभाग्यशाली पुत्रवधू पाया है। वैदेही ने गोद, पलंग और हिंडोले को छोड़कर कभी ऊबड़-खाबड़ धरती पर पांव भी नहीं रखा। जनकपुर की वाटिका में भी मुलायम घास के गलीचे बिछाए गए थे। मैं सदा संजीवनी जड़ी के समान, सावधानी से उनकी रखवाली करती हूं। कभी दीपक की बाती हटाने के लिए भी नहीं कहा। वही सुकुमारी आपके साथ वन जाना चाहती है, मेरा तो मन व्याकुल हो रहा है, आपकी क्या आज्ञा है?” जानकी को पता है, इस भीषण परिस्थिति में श्रीराम कितने दुविधाग्रस्त हो उठे हैं।

बाहर की जटिल, दुर्गम, भयानक दुनिया, जंगल में तो सिर्फ कोल-भील महिलाएं, तपस्विनी और राक्षसी ही रह सकती हैं। वैदेही की ओर तिरछे नयन से देख उनका हृदय द्रवित हो उठा था।

उन्होंने अपनी तरफ से भरसक प्रयास किया कि जानकी महल में ही रहें, इससे माताओं की भी सेवा हो जाएगी, और परिवार में सबकी भलाई भी। उन्होंने एकांत में, बाहर की दुनिया की जटिलताओं का, परेशानियों का, वैदेही के समक्ष भयानक चित्रण प्रस्तुत किया। वन की धूप, शीत और वर्षा सभी भयानक हैं। पर्वतों की गुफाएं, नदियां, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर भय से देखा भी न जाए। रीछ, भालू, बाघ, भेड़िए, सिंह और हाथी ऐसे भयानक शब्द करते हैं, जिन्हें सुनकर बड़े से बड़े वीर बांकुड़ों का भी धैर्य डगमगा जाता है। जमीन पर शयन करना, कंकड़, पत्थर, कांटों पर चलना, पेड़ों की छाल के, पत्तों के वस्त्र पहनना, कंद-मूल का भक्षण करना, ऊपर से आदमखोर जानवरों का और राक्षसों का भांति-भांति के मायावी रूप धारण कर छलना।

यह ऐसी परीक्षा की घड़ी थी, मगर जानकी के हृदय में तनिक भी अकुलाहट नहीं है। कोई भय नहीं है, कोई उन्हें अपने लक्ष्य से डिगा नहीं सकता है। कुछ समय पश्चात अपनी सासु माता से अपनी ढिठाई के लिए क्षमा मांगते हुए कहती हैं, ‘छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी’, परंतु मैंने समझ लिया है कि ‘पति के वियोग के समान संसार में कोई दूसरा दुख नहीं होता’। पुनः पति की ओर उन्मुख होकर कहती हैं, “हे प्राणनाथ! आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिए नरक के ही समान है। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य स्त्री के लिए पति के बिना शोक के समान हैं। नाथ! बाल्यावस्था में एक तपस्वी ब्राह्मण ने मुझे कहा था कि तुम पति के साथ वन में रहोगी। उस तपोनिष्ठ ब्राह्मण का वचन मिथ्या न जाए, इसलिए मेरा आपके साथ वन गमन करना नितांत अपरिहार्य है। वहां वन में आपके साथ पशु-पक्षी भी मेरे कुटुंबीजन होंगे, कंद-मूल ही अमृत के समान होंगे। वन, पहाड़, कंदरा भी अयोध्या के सैकड़ों महलों के समान होंगे। अतः हे दीनबंधु! यदि आपने मुझे चौदह वर्ष अपने से विलग अयोध्या में रखा, तो निश्चय ही मेरे प्राण नहीं बचेंगे।”

श्रीराम को उस मानिनी स्त्री का मान रखना ही पड़ा था।

अशोक वाटिका में अडिग सीता

वन में इतने साल तो वह पति की प्रतिच्छाया बनकर अपने हिसाब से प्रसन्न थीं। मगर होनी तो कहीं बैठी, कुछ और लिखने की तैयारी में लगी थी। जब छल से रावण ने उनका अपहरण कर लिया, उस समय भी उनकी प्रखर मेधाशक्ति ने उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्हें आभास था, श्रीराम अवश्य उन्हें ढूंढने का प्रयास करेंगे, कहीं रास्ते का कुछ तो पहचान होना चाहिए। उन्होंने थोड़ी-थोड़ी दूर पर अपने नाममात्र के आभूषण फेंकने प्रारंभ कर दिए थे, जो बाद में श्रीलंका तक पहुंचने का माध्यम बने।

कहां भयानक दशकंधर, और कहां कोमलांगी, सुमुखी सीता।

अपरिचित अशोक वाटिका में भीषण पहरे में बैठी वैदेही। भांति-भांति का रूप बनाकर रावण अपने अनुचरों के साथ उन्हें डराने, धमकाने, प्रलोभन देने, अपनी बात मनवाने के लिए आता है। रावण, परम ऐश्वर्यवान, जिसकी संपूर्ण लंका ही स्वर्ण निर्मित थी, राम के पास अयोध्या में मात्र एक सोने का भवन, कनक भवन। मगर वह निडर बनी आंख तक उठाकर उसे नहीं देखती हैं। उनकी निगाह में श्रीराम से बड़ा महान इस धरती पर और कोई नहीं है। रावण जितना भी वैदेही के मानसिक जगत को जीतने का प्रयास करता, उतनी ही प्रबल असफलता उसे हाथ लगती। उनके सामने वह खुद को अस्तित्वविहीन पाकर और भी क्रोध से दहकने लगता। साम, दाम, भय, क्रोध के बावजूद वैदेही ने कभी उसकी ओर आंख उठाकर नहीं देखा। कुछ कहना जब परम आवश्यक हो जाता, तब ‘तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥’ — अपने प्रियतम का स्मरण करके नीची निगाहों से ही उनके मुख से कुछ शब्द प्रस्फुटित हुए थे।

मंदोदरी आदि सब रानियों को उनकी सेवा में रखने का प्रलोभन, लाख कि पटरानी बनाने का प्रस्ताव देकर भी वह उनके विश्वास को श्रीराम के चरणों से नहीं डिगा पाया। यह था मिथिला की बेटी का परम उज्ज्वल चरित्र।

जब हनुमान को सीताजी को ढूंढने का दायित्व सौंपा गया, तब श्रीराम ने उनका परिचय देते हुए कहा कि वो जहां भी होंगी, उस छत से, उस दीवार से, यहां तक कि उनके शरीर से भी राम-राम की ध्वनि निकल रही होगी। उन्हें भी अपनी हृदयेश्वरी सीता जी के प्रेम पर अटूट विश्वास था।

लंका में हनुमान के परम विशिष्ट कार्य से अति संतुष्ट होकर सीता जी ने “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता” का आशीर्वाद दिया था। कृतज्ञता उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। दया, दान, वरदान के माध्यम से वह सदा अपने हृदय का उद्गार प्रकट करती रहती थीं।

अग्नि परीक्षा और स्वाभिमान

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, लंका विजय के बाद जब श्रीराम ने जानकी को देखते ही (ऐसा उन्होंने मात्र संसार को दिखाने के लिए कहा था) कहा कि “हे भद्रे! मैंने संग्राम में यह जो परिश्रम किया है, यह तुम्हारे लिए नहीं किया है। मैंने स्वयं को अपवाद से बचाने के लिए और अपने प्रख्यात वंश पर लगे लांछन के परिमार्जन हेतु यह युद्ध किया है। ऐसा कौन पुरुष होगा जो दूसरे के घर में रही स्त्री को स्वीकार करेगा। रावण के अंक में ली गई, दुष्ट (कामी) नेत्रों से देखी गई तुम्हारी जैसी स्त्री को कौन स्वीकार करेगा? अतः हे भद्रे! मैंने बहुत सोच-समझकर यह निर्णय लिया है कि लक्ष्मण या भरत के साथ, अथवा वानरों के राजा सुग्रीव, अथवा राक्षसराज विभीषण के साथ सुखपूर्वक रहो, अथवा अपनी बुद्धि के अनुसार जैसा तुम्हारा मन चाहे वहां निवास करो।”

प्रत्युत्तर में वैदेही कहती हैं, “प्रभु! मेरे शरीर का जो स्पर्श हुआ, उसमें काम का कोई संदर्भ नहीं था। मैं विवश थी। अतः इसमें मेरा नहीं, मेरे भाग्य का अपराध है। जब तुमने वीर हनुमान को लंका में मेरे पास भेजा था, तब क्यों नहीं सूचित किया था कि तुम्हारा यह आचरण होगा। तब मैं वानरेंद्र की इस बात को सुनते ही अपना प्राण त्याग देती। तुम जैसे नरश्रेष्ठ को क्रोध के वशीभूत होकर छोटे मनुष्य के समान आचरण नहीं करना चाहिए। तुमने मेरे स्त्रीत्व को जो यह पुरस्कार दिया है, वह तुम्हारे योग्य नहीं है। मेरी उत्पत्ति की कथा को जानते हुए भी तुमने इस प्रकार का आचरण किया है और इसका भी ध्यान नहीं रखा कि हम विवाहित हैं और मैं तुम्हारे प्रति सर्वथा समर्पित हूं। तुमने मेरी भक्ति और शील सबकुछ भुला दिया।” (आलोचना त्रैमासिक, पृष्ठ 66, सहस्राब्दी अंक तैंतीस) इसके पश्चात भी उनके मन में अपने आराध्य के लिए रत्ती भर भी कड़वाहट उत्पन्न नहीं हुई।

पति से परित्यक्त, आसन्नप्रसवा, सिर्फ अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए जीने वाली नारी के रूप में भी उनका चरित्र अनुकरणीय है। बच्चों के चारित्रिक विकास में उन्होंने बहुत बड़ा योगदान दिया था। उन्हें अपने महान रघुकुल रीति के अनुरूप शिक्षा दी। कहीं भी, कभी भी अपने दंभ से, अपनी मानसिक पीड़ा से, भीषण अपमान से, व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित होकर उन्होंने उन बच्चों के कोमल, स्निग्ध, मधुर विचारों को प्रदूषित नहीं किया।

एक हिम्मती, दृढ़ निश्चयी और कर्तव्यपरायण, विवेकमयी स्त्री के चरित्र का दूसरा पहलू भी था, जो उन्हें कठोर और अपने हित के लिए जागरूक बनाता रहा था। रावण, जो एक सिद्धहस्त वैद्य भी था, उनकी अस्वस्थता पर जब उन्हें खाने के लिए जड़ी-बूटी से निर्मित लड्डूनुमा औषधि दी, तो जानकी जी ने उसे बड़े ही निर्लिप्त भाव से, व्यर्थ की वस्तु समझकर झटक कर दूर फेंक दिया, जो पेड़ बन गया और लंका में आज भी उन वृक्षों से वह फल के रूप में पैदा होता है। इसी तरह जानकी जी ने अशोक वाटिका में अपने इर्द-गिर्द एक लकीर खींच रखी थी, जिसके बाहर वह नहीं जाती थीं।

ऐसा कहा जाता है कि श्रीराम के विरह-वियोग में रुदन करते-करते सीताजी की आंखों से इतने आंसू निकले, जो वर्तमान में भी सीता कुंड के नाम से श्रीलंका में विख्यात है। इससे यह अंदाज लगाया जा सकता है कि पति से बिछुड़कर निमिष मात्र के लिए भी वैदेही के खंजन नयन आंसू से मुक्त नहीं रहे थे।

अद्भुत प्रेमिका, जो प्रेम में केवल मिटना जानती थीं।

सीता जी के चरित्र की एक और उल्लेखनीय विशेषता यह है कि जिस लंका के बारे में तुलसीदास ने कहा है कि “लंका निसिचर निकर निवासा। इहां कहां सज्जन कर बासा॥” उस भयंकर दैत्यों के मध्य भी वह अपनी सखी ढूंढ लेती हैं। त्रिजटा, जो संयोग से श्रीराम की भक्त है, से वह अपना दुख बांटती हैं और उनसे आग मांगती हैं, जिससे अपनी ईहलीला समाप्त कर सकें। एक अभिन्न सहेली की भांति त्रिजटा बोल-भरोसा देकर उन्हें ऐसा करने से रोकती रही थी। उन्हें कभी भी क्रोध नहीं आता था। राक्षसों को मारते वक्त श्रीराम के नेत्र भी लाल हो उठते थे, मगर जानकी एकदम शीतल चंद्रमा की तरह थीं। दया, करुणा का सागर थीं। जब रघुनंदन लंका में राक्षसों का संहार कर रहे थे, सीता जी के आदेश पर किसी भी राक्षसी को नहीं मारा गया था।

एक स्थान पर सीताजी ने हनुमान से कहा है कि जो प्रेम से बदला लेते हैं, वही संत हैं। वैर की शांति वैर से नहीं, प्रेम से होती है। अपकार का बदला उपकार से और अपमान का बदला सम्मान से ले, वही संत है। अद्भुत, विलक्षण विचार है उनका।

समर्पण के साथ स्वाभिमान

वैदेही के चरित्र का एक विशिष्ट गुण यह है कि वह परम समर्पित पुत्री, प्रेमिका, पुत्रवधू, पत्नी और माता होने के साथ-साथ अपने अधिकार के लिए लड़ने वाली एक जागरूक नारी भी हैं, एवं अपने अपमान का बदला परम शांति से लेने के लिए तैयार हैं। तेरह वर्ष के वनवास के दुख को दुख समझा ही नहीं, क्योंकि प्रियतम का सान्निध्य था, एवं एक वर्ष रावण के आतंक को महज रघुनाथ के लिए सह लिया, मगर श्रीराम द्वारा परित्याग किए जाने के दंश को वह झेल नहीं पाईं।

जब श्रीराम वापस उन्हें अयोध्या लेने के लिए आते हैं, तब धरती की बेटी अपने तेज, सतीत्व और समर्पण का हवाला देकर धरती माता से फट जाने के लिए विनती करती हैं, जिससे वह अपने समस्त दुखों के साथ उसमें समा जाएं। और कथा है कि उनकी कारुणिक पुकार सुनकर पृथ्वी में चौड़ी दरार पड़ गई थी, जहां वह समाधिस्थ हो गईं।

तब श्रीराम की हृदय विदारक विरह व्याकुलता परिलक्षित हुई। अपना वामांग गंवाकर वे बेचैन हो उठे थे। मगर प्रारब्ध के आगे वह भी किंकर्तव्यविमूढ़ थे।

वास्तव में जानकी का संपूर्ण जीवन चरित्र उस परम विदुषी भारतीय नारी का है जो तन-मन-धन से अपने पति को, परिवार के लिए समर्पित तो रहती है, मगर अपना स्वाभिमान, अपना अस्तित्व और कर्तव्य नहीं भूलती। वे एक संपूर्ण नारी हैं। परम आधुनिकता और पारंपरिकता का अपूर्व संगम है उनकी जीवन गाथा।

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