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നാരീശക്തി

कहां जाएं जब अपने ही सताएं

लड़कियों के खिलाफ अपराधों में अक्सर बाहर वालों को दोषी माना जाता है, जबकि सच यह है कि सबसे ज्यादा उन्हें अपने ही परिवार वाले सताते हैं — कन्या भ्रूण हत्या से लेकर यौन प्रताड़ना और 'सम्मान' के नाम पर हत्या तक।

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महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने की तख्तियां लिए महिलाएं
ഫോട്ടോ: Photo: Ayrus Hill / Unsplash

लड़कियों-महिलाओं के प्रति जब भी अपराधों की बात उठती है, अक्सर बाहर वाले, जिनमें ससुराल वाले प्रमुख होते हैं, उन्हें अपराधी मान लिया जाता है। ससुराल में लड़कियों को तरह-तरह से सताया जाता रहा है, अब भी सताया जाता होगा, लेकिन लड़कियों के प्रति अपराध के मामले में उनके अपने घर वाले भी कम नहीं होते। उनकी दोयम दर्जे की नागरिकता अपने परिवार वाले ही तय करते हैं। बल्कि सच तो यह है कि अपने ही परिवार के द्वारा लड़कियां सर्वाधिक सताई जाती हैं, मगर कोई भी कानून इन अपराधियों की अक्सर शिनाख्त तक नहीं करता। ऐसा मान लिया जाता है कि लड़कियों को अपने परिवार से तो अगाध प्रेम मिलता है, अपराध बाहर वाले करते हैं। जबकि समाज और आंकड़ों की सच्चाई कुछ और ही कहती है।

लड़कियां जन्म ही न लें, इसकी सबसे पहले व्यवस्था कौन करता है, कौन लिंग की जांच के बाद लड़कियों को गर्भ में ही मारने की योजना बनाता है। निश्चित रूप से लड़कियों के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, बुआ, चाचा, ताऊ, मौसी। आपको याद होगा कि हाल ही में जुड़वां बच्चियों को उनकी नानी और मामा ने नहर में फेंक दिया था। माता-पिता भी लड़कियों को जन्म के बाद फेंक देते हैं, अस्पताल में छोड़कर चले जाते हैं। कई बार उन्हें मौत को भी सौंपते हैं। कहने का अर्थ ये कि जन्म लेने के बाद लड़कियों के नजदीक परिवार वाले ही उन्हें जन्म न लेने-देने की तमाम जुगत भिड़ाते हैं। इनमें से कितनों को सजा मिलती है। एकाध को छोड़कर अपराधी अक्सर बच निकलते हैं। अफसोस कि वे लड़कियों के परिजन ही होते हैं।

इसी तरह के मामले यौन प्रताड़ना और दुष्कर्म के हैं। लगभग नब्बे प्रतिशत से अधिक मामलों में ऐसे अपराधों को लड़की के परिवार के पुरुष सदस्य, नजदीक के नाते-रिश्तेदार, परिवार के परिचित, मित्रों द्वारा अंजाम दिया जाता है। यही कारण है कि ऐसे बहुत कम मामले प्रकाश में आ पाते हैं। परिवार वाले समाज में परिवार को बदनामी से बचाने के लिए ऐसे अपराधों को छिपा लेते हैं। लड़कियों को भी चुप रहने की सलाह देते हैं और न मानें तो धमकी दी जाती है। जिसके प्रति अपराध हुआ है, उसे ही अपराधी मान लिया जाता है। कितनी लड़कियां ऐसे मामलों में आत्महत्या कर लेती हैं, या जीवनभर इनका बोझ ढोती हैं।

लड़कियों को पोषण से युक्त भोजन कम से कम देना, लड़कों के मुकाबले उनकी पढ़ाई पहले छुड़वा देना, लड़कों को महंगे और लड़कियों को सस्ते स्कूल में पढ़ाना, घर के तमाम कामों की जिम्मेदारी कम उम्र होने के बावजूद लड़कियों के कंधे पर डालना, लड़कियों को कभी कानून होने के बावजूद सम्पत्ति में अधिकार न देना जैसे अनगिनत काम जो अपराध की श्रेणी में भी आ सकते हैं, लड़कियों के वे परिवार वाले करते हैं जहां वे जन्म लेती हैं। मैं अक्सर कल्पना करती हूं कि अगर लड़कियों को जन्म से पहले यह मालूम हो कि जहां वे जन्म लेने वाली हैं वहां उन्हें इस तरह के अपराधों का सामना करना पड़ेगा तो शायद वे जन्म ही न लें।

इनके अलावा हाल ही में एनसीआरबी के डाटा में बताया गया कि देश में हत्या का तीसरा बड़ा कारण प्रेम सम्बन्ध हैं। परिवार, धर्म, जाति आदि की बेड़ियां लड़के-लड़कियों को अपना मनपसंद जीवन साथी नहीं खोजने देतीं। अगर वे ऐसा कर लें तो उनकी जान पर बन आती है। सिर्फ गांव में रहने वाले युवा ही नहीं, शहरों में अपने पांवों पर खड़ी लड़कियों और लड़कों के प्रति भी ऐसे अपराध किए जाते हैं। इस डाटा के मुताबिक यों भारत में हत्या जैसे अपराधों में कमी आई है। मगर बच्चे अगर अपनी पसंद से शादी कर लें, उनकी हत्या करना जैसे अब आम हो चला है। बच्चों को धोखे से बुलाकर परिवार वाले ही खत्म कर देते हैं, जिसकी कल्पना बच्चे नहीं कर पाते।

वर्ष 2001 से 2017 के बीच यह आंकड़ा लगातार बढ़ता रहा है। इस तरह की हत्याओं के आंकड़े अट्ठाइस प्रतिशत तक पहुंच गए हैं। देश की राजधानी दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में हत्या का यह दूसरा सबसे बड़ा कारण है। आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र आदि राज्यों में हत्या का यह तीसरा बड़ा कारण है। पुलिस का कहना है कि प्रेम सम्बन्ध या शादी से इतर सम्बन्ध भी इस तरह की हत्याओं का कारण बनते हैं। बहुत से मामलों में अपने ही बच्चों को मार दिया जाता है। कई बार अपने पति के अलावा दूसरे व्यक्ति के साथ रहने में कोई व्यवधान आए, इसके लिए माताएं ही अपने बच्चों को मार देती हैं। अगर दूसरा पिता बच्चे के साथ रहता भी हो और बच्चा लड़की हो तो बेचारी लड़कियां छोटी उम्र में ही तरह-तरह के अपराधों का शिकार होती हैं। छोटे बच्चे भी इससे अछूते नहीं रहते।

जिसे सम्मान के लिए मार देना कहते हैं, वे अक्सर तभी होती हैं जब लड़के-लड़कियां अपनी पसंद से विवाह करते हैं। कई बार ऐसी घटनाएं अखबारों में जगह बनाती हैं। अप्रैल में महाराष्ट्र के कठुआ गांव में चौबीस साल की एक लड़की को उसके ही माता-पिता ने मार डाला। लड़की पेशे से फार्मासिस्ट थी। उसने एक ब्राह्मण लड़के से विवाह किया था जबकि वह मराठा थी। लड़की के घर वाले इस बात से खुश नहीं थे। उसकी शादी के कुछ दिनों बाद घर वालों ने छोटी बहन को उसके घर भेजा। बहन ने जाकर कहा कि घर वालों ने उसकी शादी को स्वीकार कर लिया है। वह घर चले। माता-पिता ने उसे बुलाया है। लड़की खुशी-खुशी घर आई और वहां उसे जलाकर मार डाला गया। परिवार वालों को उस पर जरा भी दया नहीं आई।

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