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സാഹിത്യം

क्या आप संसार में सबसे सुखी बनना चाहते हैं

यक्ष के प्रश्न पर युधिष्ठिर ने कहा था कि संसार में सबसे सुखी वह है जिस पर कोई ऋण नहीं। जानिए शास्त्रों में बताए पांच ऋण और उनसे मुक्ति का उपाय।

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वन में पांचों पांडव
ഫോട്ടോ: Photo: Unknown artist, Deccan (historical painting) / Wikimedia Commons (Public domain)

महाभारत में एक प्रसंग आता है कि एक बार पांच पांडव वन में भटक गए। भटकते-भटकते उन्हें प्यास लगी। ज्यादा थकावट के कारण सभी एक स्थान पर बैठ गए। युधिष्ठिर महाराज जी ने पहले नकुल, फिर सहदेव, फिर अर्जुन और अंत में भीम को जल की खोज में भेजा। जब काफी समय हो गया, कोई नहीं लौटा, तब युधिष्ठिर महाराज चिंतित हुए व स्वयं जल व भाइयों की खोज में निकले। कुछ दूर जाने पर एक सरोवर दिखा व समीप ही अपने भाइयों को मृत पड़े देखा। अपने चारों भाइयों की ऐसी अवस्था देखकर बहुत हैरान हुए व सोचने लगे कि घाव का कोई चिह्न भी नहीं, तो भी मेरे बलशाली, शूरवीर भाई मृत कैसे?

उन्होंने धैर्य नहीं खोया! जल की प्यास सताई तो समीप के सरोवर से पानी पीने के लिए उठे। स्वच्छ जल जैसे ही अंजुली में भरा, तभी एक ध्वनि हुई, आप ऐसे जल नहीं पी सकते। जल पीने से पहले आपको मेरे प्रश्नों का उत्तर देना होगा, अन्यथा आपकी भी वही हालत होगी जो आपके भाइयों की हुई है।

युधिष्ठिर महाराज ने सिर उठाकर देखा कि एक बगुला प्रश्नों के बारे में कह रहा है। युधिष्ठिर महाराज ने कहा, एक बगुला मेरे भाइयों को मार सकता है, ऐसा मैं विश्वास नहीं कर सकता। आप कौन हैं? अपने वास्तविक रूप में आएं।

तब बगुले ने यक्ष का रूप धारण कर लिया और कई प्रश्न किए। बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, वे सभी। उन्हीं में एक प्रश्न था कि संसार में सबसे सुखी कौन है?

युधिष्ठिर महाराज जी ने उत्तर दिया कि संसार में सबसे सुखी व्यक्ति वह है जो अऋणी है, अर्थात् जिस पर कोई ऋण नहीं है। यहां पर युधिष्ठिर महाराज केवल धन की बात नहीं कर रहे हैं, उनका कहने का तात्पर्य है समस्त प्रकार के ऋण।

आज के जगत में आम धारणा हो गई है धन का ऋण लेने की। कोई होम लोन ले रहा है तो कोई बिजनेस लोन, कोई पर्सनल लोन ले रहा है तो कोई पढ़ाई के लिए ऋण ले रहा है। अब तो रोजमर्रा की वस्तुएं भी उधार मिलने लगी हैं।

थोड़ा सा अगर हम ध्यान दें तो जब हम पर महीने के प्रारंभ में किसी मासिक किस्त को उतारने का बोझ आ जाता है तो हमें एक तरह से चिंता लग जाती है। हमारे ही देश में कुछ समय पहले कृषि उत्पादकों ने इसी ऋण की परेशानी में आत्मदाह तक कर लिया था। अभी तक तो हम केवल धन के ऋण के कारण ही चिंतित हैं, अन्य ऋण का तो हमें ध्यान ही नहीं है।

पांच प्रकार के ऋण

हमारे शास्त्र हमें बताते हैं कि सभी मनुष्य पांच प्रकार के ऋण से ग्रस्त हैं। वे हैं ऋषि ऋण, देव ऋण, माता-पिता का ऋण, अन्य प्राणियों का ऋण तथा राजा का ऋण। ऋषियों ने हमें ज्ञान दिया, देवता हमें वर्षा-धूप-अनाज इत्यादि देते हैं, माता-पिता हमें बचपन से प्रारंभ कर सभी कुछ सिखाते हैं, प्राणी मात्र के कारण हमें कपास, अनाज, बने-बनाए मकान, मोटर कार, जहाज इत्यादि मिलते हैं। राजा अपनी प्रजा का अपने पुत्रों की तरह पालन करता है, सुरक्षा प्रदान करता है आदि। अतः हम सब इनके ऋणी हैं।

बैंक की किस्त अगर कुछ महीने न चुकाओ तो वे ऋण (लोन) देना तो बंद करते ही हैं, साथ ही साथ वह वस्तु भी हमसे छीन लेते हैं। उपरोक्त पांच प्रकार के ऋण देने वालों में से कोई एक भी अगर ऋण देना बंद कर दे तो सोचिए हमारी क्या अवस्था होगी? धन के ऋण के बिना तो हम जीवन निकाल ही लेंगे, परंतु अनाज, हवा, पानी इत्यादि के बिना तो हम जी ही नहीं पाएंगे।

सोचिए तो कितना उपकार है इन सबका हम पर। कोई भी जगत का व्यक्ति अपकारी अथवा एहसान-फरामोश नहीं कहलवाना चाहता। अब यह जो पांच प्रकार के ऋण हैं, इनको चुकाए बगैर तो हम सुखी नहीं हो सकते। राजा का ऋण तो हम टैक्स इत्यादि देकर चुका देते हैं, परंतु बाकी तो देते ही नहीं। फिर मजे की बात यह है कि कोई व्यक्ति दुःख नहीं चाहता, बल्कि सुख ही चाहता है। अब जब ऋण चुकाए बगैर कोई सुखी नहीं हो सकता तो इसका कोई उपाय तो होगा?

ऋण से मुक्ति का उपाय

हमारे शास्त्र इसकी युक्ति बताते हैं। वह है भगवान की शरण। भगवान की शरण लेने से वे हमें समस्त प्रकार के ऋणों से मुक्त कर देते हैं। सारी सृष्टि के मूल में भगवान हैं। जैसे किसी पौधे के मूल अथवा जड़ में जल देने से उसके पत्ते, टहनी इत्यादि सबको जल मिल जाता है। केवल पत्ते या टहनी को जल देते रहने से समस्त वृक्ष को जल नहीं मिलता। उसी प्रकार एक-एक ऋण उतारने से सभी ऋण चुकते नहीं हो सकते। बेहतर है कि हम सभी ऋण देने वालों के मूल में जो हैं, अर्थात् सभी के जो स्रोत हैं, श्रीकृष्ण, उनकी शरण में जाएं। भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाने से ही हम सुखी हो सकते हैं।

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