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నారీ శక్తి

रूप का रखवाला घूंघट

रसोईघर से ऑफिस तक पहुंची नारी के लिए घूंघट धीरे-धीरे नकारा जा रहा है। घूंघट के फायदे, उसके नुकसान और कवियों-शायरों की नज़र में उसका सौंदर्य — परंपरा पर एक संतुलित नज़र।

అనువాదం త్వరలో వస్తుంది. ఈ వ్యాసం ఇంకా తెలుగులో అందుబాటులో లేదు, అందుకే మీరు దీన్ని हिन्दीలో చదువుతున్నారు.

घूंघट में भारतीय महिला
ఫోటో: Photo: AMISH THAKKAR / Unsplash

किसी परंपरा के बनने में सदियां लगती हैं, तो उसके टूटने में उससे भी अधिक समय और साहस की ज़रूरत पड़ती है। यह बात पर्दा-प्रथा पर भी लागू होती है। धीरे-धीरे घूंघट को नकारा जा रहा है। नारी का कार्य क्षेत्र रसोईघर से ऑफिस तक प्रसारित हो जाने के कारण भी पर्दा उपेक्षित हुआ। कामकाजी महिलाओं के लिए अब यह अनुकूल नहीं रहा है। बतौर फैशन के नगरों में पर्दे का चलन बढ़ा भी है। युवतियां धूप एवं प्रदूषण से बचने के लिए दुपट्टे अथवा अन्य झीने वस्त्र से सारा मुखड़ा ढककर चलती हैं, हाथों पर भी धूप के प्रभाव से बचने के लिए दस्ताने पहनती हैं। युवक भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं, वे पूरे चेहरे को नकाब से ढककर सड़कों पर वाहन चलाते नज़र आते हैं। दूसरी ओर अब शादियों में दुल्हनें भी बिना घूंघट के ही दिखाई देती हैं।

घूंघट के फायदे

इस बात के नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों पहलू होते हैं। घूंघट को एक पक्ष से देखें तो कुछ फ़ायदे भी हैं, यथा — धूप और धूल से यह शरीर की रक्षा करता है। सूर्य की पराबैंगनी किरणों के हानिकारक प्रभाव से हमें बचाता है। पर्दे के कारण चेहरे का रंग निखर जाता है। इससे बाल भी सुरक्षित रहते हैं और देर से श्वेत होते हैं। इसलिए कहावत प्रचलित है — ‘धूप में ही बाल सफ़ेद नहीं किए हैं।’ पर्दे की सुरक्षा में खूबसूरती बरकरार रहती है एवं लोगों की कुदृष्टि का शिकार भी सुंदरता नहीं हो पाती और फिर जिज्ञासा, दीदार का आनंद तो घूंघट से ही मिल सकता है।

प्रायः मूर्तियों या अन्य नूतन वस्तुओं के अनावरण के लिए भव्य समारोहों का आयोजन किया जाता है। जब सब कुछ दृश्य है तो जिज्ञासा कहां रहेगी, इसीलिए तो मंदिरों के पट भी बंद रखे जाते हैं और समय-समय पर ही खोले जाते हैं। भगवान के शृंगार के जब अलग-अलग निश्चित वक़्त पर पट खुलते व बंद होते हैं, तब दर्शन का अलग ही माधुर्य अनुभूत होता है। चबूतरों पर अनावरित मूर्तियों के दर्शन प्रायः आध्यात्मिक आकर्षण का केंद्र नहीं बन पाते। दुल्हन जब घूंघट में होती है, तब उसे देखने के लिए सभी लालायित रहते हैं और फिर बेहद खूबसूरती क़यामत भी तो बन जाती है —

ये हुस्न जो कातिल है, क़यामत है, कज़ा है। घूंघट ही में अच्छा है कि दीदार न कर यूं।

घूंघट का दूसरा पक्ष

पर्दे का दूसरा पक्ष तो ग़ौरतलब है ही। घूंघट में कैद आंखों को बाहर की दुनिया अस्पष्ट नज़र आती है और बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं पेश आ जाती हैं। कभी-कभी तो दो बारातों के एक साथ होने पर दुल्हनें बदल जाने की ख़बरें भी अख़बार में मिल जाती हैं। घूंघट के कारण स्त्रियां कूप मंडूक होकर रह जाती हैं। बाहरी दुनिया से बेखबर केवल सांस भर लेना उनका जीवन रह जाता है। इसके अलावा पर्दे में घुटन भी होती है। गर्मी का प्रकोप भी सहना पड़ता है।

वैसे घूंघट करने के अलग-अलग अंदाज़ हैं। कुछ स्त्रियां सिर्फ़ आंखों तक पर्दा करती हैं, तो कुछ नाक तक आंचल ढके रहती हैं, कुछ स्त्रियां ठोड़ी तक तो कुछ उससे नीचे लंबा घूंघट काढ़ती हैं, तो कोई बगल से आधा मुख ढककर रखती हैं और फिर इसके अंदर से झांकने के अंदाज़ के तो कहने ही क्या...।

कवियों की नज़र में घूंघट

नग्नता सदैव कुरूप ही होती है और अर्धदर्शिता सौंदर्य का प्रतीक। चंद्रमा अपनी कलाओं के आधार पर ही सुंदरता का श्रेष्ठतम उपमान बन गया है। प्रथमा से चौदहवीं के चांद तक घूंघट का उतार-चढ़ाव चांद की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। पूर्ण चंद्र के सौंदर्य का उपमा में उपयोग नहीं किया जाता।

तेरे मुख पर तेज सत्य का, दाग नहीं तेरे चेहरे पर, तेरे आगे सूरज मद्धम, कैसे कह दूं, माहजबीं तू।

वस्तुतः घूंघट स्त्रैण सौंदर्य का अनुवर्द्धक ही है —

आंखों तक आ के जब आंचल ठहरा, ये लगा झील पे बादल ठहरा।

वैसे घूंघट का सदुपयोग व दुरुपयोग दोनों संभव हैं और यह कार्य पुरुष ही नहीं स्त्रियां भी अंजाम देती आई हैं। कोई-कोई स्त्री तो अंगुलियों से तिकोनी जगह बनाकर एक आंख से जब देखती है, तब घूंघट की अनिर्वच सुषमा का वर्णन करने में कवि-शायर भी पीछे नहीं रहे। घूंघट के अभिराम लावण्य का अपने ही ढंग से बखान किया है —

सबब खुला है यही उनके मुंह छुपाने का, चुरा न ले कोई अंदाज़ मुस्कुराने का।

समय के अनुकूल परिवर्तन

घूंघट एक तरफ़ मान-मर्यादा और लज्जा का प्रतीक भी है, तो दूसरी तरफ़ कई प्रकार की दुर्घटनाओं का जनक भी। अतः अनावश्यक पर्दाप्रथा से मुक्त होकर ऐसी दुर्घटनाओं में कमी की जा सकती है। किंतु हां, समय के अनुकूल परिवर्तन स्वीकारना ही मानव कल्याण के लिए उचित है। जहां ज़रूरत हो पर्दा करने में कोई नुकसान नहीं है, लेकिन प्रथा मात्र को हर वक़्त ढोते रहना असंगत ही कहा जाएगा। अंततः यही कहा जा सकता है कि —

निगाहे-नाज़ का सिंगार भी यही घूंघट, बने जो बोझ तो आज़ार भी यही घूंघट। यही है लाज का, ग़ैरत का आस्ताना, ‘यक़ीन’, फ़रेबे-हुस्न का बाज़ार भी यही घूंघट।

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