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नीति बने बुजुर्गों की सेवा-संभाल के लिए

एकल परिवार, महंगाई और आर्थिक मंदी के बीच भारत के बुजुर्ग पूरी तरह बच्चों पर निर्भर होते जा रहे हैं, जबकि देश में उनकी देखभाल का तंत्र लगभग नगण्य है। समय रहते ठोस नीति न बनी तो समाज पर इसके गंभीर नतीजे होंगे।

अनुवाद लवकरच येत आहे. हा लेख अद्याप मराठी मध्ये उपलब्ध नाही, म्हणून तुम्ही तो हिन्दी मध्ये वाचत आहात.

भारतीय बुजुर्ग दंपति
छायाचित्र: Photo: PRATEEK JAISWAL / Unsplash

भारत की पारंपरिक रिवायतों में एक यह भी रीत थी कि बड़े बुजुर्ग अपने जिन बच्चों के साथ रहते थे, पुत्रों की ऊपर-नीचे होती आमदनी के बावजूद संयुक्त परिवार प्रणाली के चलते उनकी आर्थिक जरूरतें किसी तरह पूरी हो जाया करती थीं। घर-समाज में बुजुर्गों का सम्मान भी किया जाता था और उन्हें परिवार के फैसलों में आदर वाला महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता था। तेजी से बढ़ते शहरीकरण की वजह से संयुक्त परिवारों की जगह एकल-सूक्ष्म परिवारों ने ले ली और बुजुर्ग अपनी जरूरतों के लिए किसी एक बेटे या बेटी पर निर्भर होकर रह गए। अब लगातार बढ़ती महंगाई, दीगर ऊपरी खर्चों के चलते बच्चों के लिए भी अपने माता-पिता को मदद देने में मुश्किल होती जा रही है, तिस पर अगर आमदनी गिर जाए या नौकरी चली जाए या फिर आर्थिकी मंद पड़ जाए तो मुश्किलें गहरा जाती हैं।

फिलहाल भारत आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है, जिसकी वजह से अगले कुछ महीनों में और अधिक नौकरियों में छंटनी और उद्योग-धंधे बंद होने की संभावना है। हालांकि सरकार ने मंदी से उबरने हेतु अनेक कदम उठाए हैं लेकिन हाल-फिलहाल नतीजे उत्साहवर्धक नहीं हैं। अब अगर कोई त्वरित और प्रभावशाली उपाय कारगर नहीं हो पाया तो समाज पर इसके गंभीर नतीजे होंगे।

ऐसी खबरें अक्सर देखने को मिल रही हैं, जिनमें बच्चे अपनी आमदनी कम होने पर खुद पर आश्रित बुजुर्गों से दुर्व्यवहार कर रहे हैं, वे आगे अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च की एवज में वृद्ध माता-पिता की देखभाल को गौण करते हैं। दूसरी ओर ऐसे मामले भी हैं जब गंभीर बीमारी से जूझ रहे मां-बाप की देखभाल के लिए बच्चों ने नौकरी तक छोड़ दी और सीमित संसाधनों में भी उनकी सेवा कर रहे हैं।

साठ साल से ऊपर के बुजुर्गों के लिए भारत में विकसित देशों के मुकाबले हालात बहुत खराब हैं क्योंकि कोई निजी आमदनी न होने पर वे अपनी संभाल के लिए पूरी तरह से परिवार के युवा सदस्यों पर आश्रित होते हैं। अपनी बचत को उन्होंने घर बनाने में लगा दिया होता है और उसे स्वेच्छा से पुत्र-पुत्रियों को सौंप चुके होते हैं। बच्चों में कुछ ऐसे हैं भी जो इन घरों को बेच देते हैं और सारा पैसा हड़प लेते हैं। अपने पोते-पोतियों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने में सहयोग देने की खातिर उन्हें छोटी जगहों में सिकुड़कर रहना पड़ता है, तिस पर कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं। इस तरह जिंदगी के आखिरी साल बहुत दयनीय हालात में गुजरते हैं।

पश्चिमी देशों के खुदमुख्तार बुजुर्गों के बरअक्स भारत में आज भी अधिकांश वृद्ध अपने परिवार के साथ रहते हैं, केवल 2.2 प्रतिशत अकेले बुजुर्ग अपने बूते पर जीने की सामर्थ्य रखते हैं और 10 फीसदी वृद्ध दंपति ही अपने भरण-पोषण-जीवनशैली हेतु आत्मनिर्भर हैं। लगभग 87.8 प्रतिशत बुजुर्ग अपने बच्चों के साथ रह रहे हैं। इसकी तुलना में पश्चिमी देशों में लगभग सभी उम्रदराज लोग अलग रहते हैं जहां वे अपनी अधिकांश जरूरतें बिना किसी खास मदद या बाहरी सहायता के पूरी कर लेते हैं। शारीरिक तौर पर भी वे हमारे वृद्धों की अपेक्षा ज्यादा चुस्त और सक्रिय हैं। उनके मुल्कों के स्वास्थ्य तंत्र में बुजुर्गों की माकूल स्वास्थ्य देखभाल, प्रतिरोधात्मक शारीरिक जांच और अन्य किस्म की स्वास्थ्य सेवाएं जैसे कि फिजियोथेरेपी बिना शुल्क प्राप्त है। इधर भारत में चूंकि परिवार ही बुजुर्गों के भरण-पोषण-स्वास्थ्य का मुख्य जरिया है और जैसे-जैसे वे वृद्ध और कमजोर होते जाते हैं वैसे-वैसे उनकी आश्रिता बढ़ती जाती है।

दुर्भाग्य से भारत में बुजुर्गों की देखभाल का तंत्र लगभग नगण्य है और हमारी सामाजिक सुरक्षा प्रणाली विश्व भर में सबसे कमजोर व्यवस्थाओं में से एक है। वृद्धों का आर्थिक रूप से स्वावलंबी होना उनकी अच्छी हालत का एक मुख्य पैमाना होता है, परंतु वृद्धों में केवल 26.3 प्रतिशत ही आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं और 20.3 फीसदी आंशिक रूप से, लेकिन बहुत बड़ी तादाद यानी 53.4 प्रतिशत बुजुर्ग आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा मामलों में पूरी तरह अपने बच्चों पर निर्भर हैं। कम खर्च में मिलने वाले वृद्ध आश्रमों की बहुत कमी है। जो बढ़िया हैं, वे बहुत महंगे हैं।

तेजी से बदलते उम्र वर्गीकरण के अंतर्गत आज के युवाओं की औसत आयु 27.1 वर्ष आंकी गई है, इसका मतलब औसत भारतीय युवा आर्थिक रूप से सक्षम होने से पहले ही प्रौढ़ों की श्रेणी में आ जाता है! बच्चे पैदा करने की सामर्थ्य में लगातार होते ह्रास ने भारतीयों में पहले वक्त की अपेक्षा समय से पहले बूढ़े होने की गति बढ़ा दी है।

सर्व पहा