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ओ बुआ पैसा दे जा ना.. रिश्तों में अब वो मिठास क्यों नहीं

कहानी रिश्तों की: गर्मी की छुट्टियों में आई बुआ के जाते समय राजू और पिंकी रिक्शे के पीछे दौड़ पड़ते हैं, क्योंकि उनका लगाव पैसों से नहीं, अपनेपन से था।

અનુવાદ ટૂંક સમયમાં આવી રહ્યો છે. આ લેખ હજી ગુજરાતીમાં ઉપલબ્ધ નથી, તેથી તમે તેને हिन्दीમાં વાંચી રહ્યા છો.

बुआ एक छोटे बच्चे को प्यार से पैसे देती हुई
ફોટો: Photo: Gyan Shahane / Unsplash

अब रिश्तों में वो मिठास नहीं रही, अक्सर ज्यादातर लोगों की यही शिकायत रहती है, लेकिन इसके पीछे कितने कारण हैं, उनको खोजने का काम कोई नहीं कर रहा। रिश्ते चाहे परिवार के बीच हों या सामाजिक। अब दोस्त होने के बाद भी कई बार लोग खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं। दरअसल, आज हर कोई अपने आप तक ज्यादा सीमित है, केवल उन्नति और तरक्की के लिए, बस दूसरों से होड़ करने के लिए ही लोग दूसरों पर ध्यान देते हैं, बल्कि तीन से चार दशक पहले ऐसा कम था, इसी लिए रिश्ते लंबे और गहरे होते थे। इसका एक अच्छा उदाहरण घर आने वाले पारिवारिक सदस्य और मेहमान से ही लें तो पता चल जाएगा। यह कहानी ऐसे ही एक रिश्ते पर आधारित है।

कहानी रिश्तों की

यहां एक भतीजा अपनी बुआ से बहुत प्रेम करता है, वह जब अपने मायके यानी भतीजे के घर आती है तो सभी बच्चों में बहुत उत्साह होता है। वे इसलिए ज्यादा उत्साहित होते हैं कि बुआ उनके लिए कुछ गिफ्ट लेकर आएगी और जाते समय कुछ पैसे देकर जाएगी, जो उनकी पसंद की चीजें बाजार से खरीदने और मौज-मस्ती के लिए काम आएंगे। यहां पिंकी और राजू दो बच्चे ऐसे ही हैं जो गर्मी की छुट्टी में अपनी बुआ का इंतजार बेसब्री से करते हैं। जून में उनकी बुआ घर आती है। राजू और पिंकी बहुत खुश होते हैं।

दिन-रात वे दोनों बुआ को नहीं छोड़ते। साथ खाना, घूमना और नींद आने पर साथ सो जाना उनका पहला काम था। कुछ दिन के बाद बुआ अपनी ससुराल जाने लगती है। सभी भारी मन से उन्हें विदाई देते हैं। राजू और पिंकी का तो मानो सब कुछ जाने वाला हो, ऐसा उनके चेहरे पर दिखाई दे रहा था। अब क्या था, बुआ रिक्शे में बैठकर जाने लगती है। कुछ दूर तक राजू और पिंकी उन्हें रोकने के लिए दौड़ लगाते हैं, लेकिन रिक्शा धीरे-धीरे गति पकड़ने लगता है। हार कर जब और पीछा करने में राजू और पिंकी थकने लगते हैं तो पिंकी जोर से चिल्लाकर बोलती है, अरे बुआ रुक जा न, कल चली जाना। पर बुआ का रिक्शा रुकने वाला नहीं, ऐसा देख कर पिंकी कहती है, अरे बुआ नहीं रुक रही तो ओ बुआ पैसे तो देती जा। इतने में बुआ को ध्यान आता है कि बच्चों को चलते समय पैसे देना तो भूल ही गई, वह रिक्शेवाले को थोड़ा रुकने को बोलती है। रिक्शा रुकता है, दोनों बच्चे हांफते हुए उसके पास पहुंचते हैं। बुआ राजू और पिंकी को दस-दस रुपए देती है।

दोनों पैसे पाकर खुश तो हैं, लेकिन बुआ के जाने से वे अब भी काफी दुखी हैं, यह दुख उन्हें दो-तीन दिन तक सताता है, फिर धीरे-धीरे परिवार में वैसे ही चहकने लगते हैं। वे दोनों नहीं जानते थे कि रिश्तों का क्या अर्थ है, लेकिन उनकी भावनाओं और अपनेपन से पता लगता है कि वे पैसे के लिए नहीं, अपनेपन के लिए बुआ के इतने करीब थे।

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